बंगलोर और अहमदाबाद के दिल दहलाने वाले विस्फ़ोटों में अपनी जान और सब कुछ लुटा देने वालों के नाम यह श्रद्धांजलि दे रही हूं :
अब के सावन मेरे यहां बरखा नहीं बरसती,
अब के सावन फ़िज़ाओं में दहशतों की बारिश है
बादलों का शोर, बमों के शोर तले दब गया है
फ़ीकी पड गई है बिजुरी की कौंध,आगजनी की रोशनी में
अब के सावन मेरे यहां मल्हार के सुर नहीं बिखर रहे
बिखरा हुआ है तमाम शहर में, रोदन का शोर
खो गईं हैं बच्चों की किलकारियां,सावन की टीप
पसर गया है सन्नाटा,मासूमों की चीख
अब के सावन कोई बाहर भीगने नहीं जा रहा
भीगे हैं सबके नैन दहशत की बाढ में
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Monday, July 28, 2008
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