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Wednesday, March 26, 2008

सेन्स-नोनसेन्स: रोमान्स की कमी !

कभी कभी ऐसे लोगों से पाला पड जाता है, जिनकी भोलेपन में की गई कोई कोई बात बरबस ही होठों पर हंसी ले आती है.बात बहुत पुरानी है लेकिन आज भी याद करते ही मन में हंसी फ़ूट पडती है.ये बात मध्यप्रदेश के एक बहुत छोटे से कस्बे से ताल्लुक रखती है, जहां मेरी बुआ का ससुराल है.उनके पडोस में एक अल्प-शिक्षित महिला रहती थीं. काफ़ी दिनों से वो कुछ असवस्थता महसूस कर रही थी. जैसा कि अमूमन होता है, उनके स्वास्थ्य के प्रति कोई घर-वाला सजग नहीं था, सो वो खुद ही अपनी जांच कराने चिकित्सक के पास चली गईं.कुछ देर बाद जब वो लौट रही थे तो बुआ से उनका सामना हो गया.बुआ ने चिन्ता से पूछा," का बताया डाक्टर ने,चच्ची?" चच्ची लम्बी उसांस लेकर बोलीं,"अब का बताएं दुल्हन, डाक्टर ने सारी जांच करके कहा कि हम को रोमान्स की कमी हो गई है, अब वो ही हमारा इलाज कर के रोमान्स की कमी दूर करेगा.ये लो रपट और पर्चा पढ लो".बुआ ने पर्चा हाथ में लेकर ज्यूं ही पढा, वो हंसते हंसते लोट-पोट हो गईं.चच्ची के पर्चे में लिखा था,हार्मोन्स की कमी.बुआ बोलीं "ये लो चच्ची,तुम चच्चा से बोल के तो देखो, ये कमी तो चच्चा ही दूर कर सकते हैं,इसमें डाक्टर बिचारा कछु नहीं कर पाएगा".फ़िर क्या था,चच्ची की बीमारी सारे कस्बे के टाइम-पास का ज़रिया बन गई.
ऐसा ही एक किस्सा मेरे घर काम करने वाली सुमति से ताल्लुक रखता है.सुमति बिहार की है और मुझे उसकी बिहारी भाषा बहुत रोचक लगती है.एक दिन वो बातों बातों में किसी रिश्तेदार से हुई भेंट का ज़िक्र करते हुए बोली,"ऊ तो हुमको बदवे ही मिल गईल".दिमाग पर बहुत ज़ोर लगाने पर भी जब हमको बदवे शब्द का मतलब समझ नहीं आया तो शाम को सुमति से ही हमने इस खास शब्द पर प्रकाश डालने का आग्रह किया. वो बडी ठसक से बोलीं,"का हो दीदी? ओ दिन आप ही तो अपनी सहेलिया से कहबू करे कि तोका तोहार मामी बदवे ही बजार मां मिल गई रहिन". बात हमारी समझ में आ ही गई आखिरकार.शायद आप ना समझ पाये हों . दर-असल सुमति जी ने हमें अपनी सहेली से फ़ोन पर गपियाते सुन लिया था, जब हम अपनी सहेली से कह रहे थे कि हमारी मामीजी हमको बाज़ार में by the way मिल गई थीं.अब सुमतिजी के भाषा ग्यान पर हंसें या सर फ़ोडें, आप ही बतायें.